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महाराणा प्रताप का इतिहास( History of Maharana Pertap ) 2020

 

 वीर योद्धा महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप के नाम से भारतीय इतिहास गुंजायमान हैं। यह एक ऐसे योद्धा थे। जिन्होंने मुगुलों को छटी का दूध याद दिला दिया था। इनकी वीरता की कथा से भारत की भूमि गोरवान्वित हैं।  महाराणा प्रताप मेवाड़ की प्रजा के राणा थे।  प्रताप राजपूतों में सिसोदिया वंश के वंशज थे।  यह एक बहादुर राजपूत थे।  जिन्होंने हर परिस्थिती में अपनी आखरी सांस तक अपनी प्रजा की रक्षा की।  इन्होने सदैव अपने एवम अपने परिवार से उपर प्रजा को मान दिया। एक ऐसे राजपूत थे।  जिसकी वीरता को अकबर भी सलाम करता था।

 

महाराणा प्रताप का इतिहास

महाराणा प्रताप का जन्म दिन आज के कैलेंडर के अनुसार 9 मई 1540 में उत्तर दक्षिण भारत के मेवाड़ में हुआ था। प्रताप उदयपुर के राणा उदय सिंह एवम महारानी जयवंता बाई के पुत्र थे।  महाराणा प्रताप की पहली रानी का नाम अजबदे पुनवार था। अमर सिंह और भगवान दास इनके दो पुत्र थे।  अमर सिंह ने बाद में राजगद्दी संभाली थी।

महारानी जयवंता के अलावा राणा उदय सिंह की और भी पत्नियाँ थी। जिनमे रानी धीर बाई उदय सिंह की प्रिय पत्नी थी। रानी धीर बाई की मंशा थी। कि उनका पुत्र जगमाल राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी बनेण् इसके अलावा राणा उदय सिंह के दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे।  इनमे भी राणा उदय सिंह के बाद राजगद्दी सँभालने की मंशा थी। लेकिन प्रजा और राणा जी दोनों ही प्रताप को ही उत्तराधिकारी के तौर पर मानते थे।  इसी कारण यह तीनो भाई प्रताप से घृणा करते थे।

इसी घृणा का लाभ उठाकर मुग़लों ने चित्तोड़ पर अपना विजय पताका फैलाया था। इसके आलावा भी कई राजपूत राजाओं ने अकबर के आगे घुटने टेक दिए थे और आधीनता स्वीकार की जिसके कारण राजपुताना की शक्ति भी मुगलों को मिल गई जिसका प्रताप ने अंतिम सांस तक डटकर मुकाबला कियाए लेकिन राणा उदय सिंह और प्रताप ने मुगलों की आधीनता स्वीकार नहीं की।  आपसी फुट एवम परवारिक मतभेद के कारण राणा उदय सिंह एवम प्रताप चित्तोड़ का किला हार गए थे।  लेकिन अपनी प्रजा की भलाई के लिए वे दोनों किले से बाहर निकल जाते हैं।  और प्रजा को बाहर से संरक्षण प्रदान करते हैं।  पूरा परिवार एवम प्रजा अरावली की तरफ उदयपुर चला जाता हैं।  अपनी मेहनत और लगन से प्रताप उदयपुर को वापस समृद्ध बनाते हैं और प्रजा को संरक्षण प्रदान करते हैं।  अकबर से डर के कारण अथवा राजा बनने की लालसा के कारण कई राजपूतों ने स्वयं ही अकबर से हाथ मिला लिया था। और इसी तरह अकबर राणा उदय सिंह को भी अपने आधीन करना चाहते थे।

हल्दी घाटी युद्द(War of HaldiGhati)

महाराणा प्रताप और मुगुलो का  युद्ध

यह इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था। इसमें मुगलों और राजपूतों के बीच घमासान हुआ था। जिसमे कई राजपूतों ने प्रताप का साथ छोड़ दिया था और अकबर की आधीनता स्वीकार की थी।

महाराणा प्रताप का इतिहास( History of Maharana Pertap ) 2020
महाराणा प्रताप का इतिहास( History of Maharana Pertap ) 2020

हल्दीघाटी का यह युद्ध कई दिनों तक चला । मेवाड़ की प्रजा को किले के अंदर पनाह दी गई। प्रजा एवम राजकीय लोग एक साथ मिलकर रहने लगे। लबे युद्ध के कारण अन्न जल तक की कमी होने लगीण् महिलाओं ने बच्चो और सैनिको के लिए स्वयम का भोजन कम कर दिया। सभी ने एकता के साथ प्रताप का इस युद्ध में साथ दिया। उनके हौसलों को देख अकबर भी इस राजपूत के हौसलों की प्रसंशा करने से खुद को रोक नहीं पाया। अन्न के आभाव में प्रताप यह युद्ध हार गये। युद्ध के आखरी दिन जोहर प्रथा को अपना कर सभी राजपूत महिलाओं ने अपने आपको अग्नि को समर्पित कर दियाण् और अन्य ने सेना के साथ लड़कर वीरगति को प्राप्त किया।  सबसे वरिष्ठ अधिकारीयों ने राणा उदय सिंह, महारानी धीर बाई जी और जगमाल के साथ प्रताप के पुत्र को पहले ही चित्तोड़ से दूर भेज दिया था। युद्ध के एक दिन पूर्व उन्होंने प्रताप और अजब्दे को नीन्द की दवा देकर किले से गुप्त रूप से बाहर कर दिया था। इसके पीछे उनका सोचना था कि राजपुताना को वापस खड़ा करने के लिए भावी संरक्षण के लिए प्रताप का जिन्दा रहना जरुरी हैं।

मुगुलो ने जब किले पर हक़ जमाया तो उन्हें प्रताप कहीं नहीं मिला और अकबर का प्रताप को पकड़ने का सपना पूरा नही हो पाया।

युद्ध के बाद कई दिनों तक जंगल में जीवन जीने के बाद मेहनत के साथ प्रताप ने नया नगर बसाया जिसे चावंड नाम दिया गया। अकबर ने बहुत प्रयास किया लेकिन वो प्रताप को अपने अधीन ना कर सका।

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Pakhandi Sadhu

 

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